मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदयया
by which
धर्मम्
righteousness
अधर्मम्
unrighteousness
च
and
कार्यम्
what ought to be done
च
and
अकार्यम्
what ought not to be done
एव
indeed
च
and
अयथावत्
not as they are
प्रजानाति
knows
बुद्धिः
intellect
सा
that
पार्थ
O Partha
राजसी
rajasic.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! जो बुद्धि धर्म और अधर्म को तथा कार्य और अकार्य को यथार्थ रूप से नहीं जानती (विपरीत या अधूरा जानती है) – वह बुद्धि राजसी है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस बुद्धि में विवेक तो होता है, पर वह पूर्ण या यथार्थ नहीं होता। वह धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य को कभी सही, कभी गलत समझती है, या उसमें संशय रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! जो बुद्धि धर्म और अधर्म को तथा कार्य और अकार्य को यथार्थ नहीं (अधूरा या विपरीत) जानती है – वह बुद्धि राजसी है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
राजस बुद्धि में निर्णय क्षमता का अभाव होता है। वह उचित-अनुचित का सही निर्णय नहीं कर पाती, जिससे व्यक्ति भ्रमित रहता है।