मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदअधर्मम्
unrighteousness
धर्मम्
righteousness
इति
thus
या
which
मन्यते
thinks
तमसा
by ignorance
आवृता
covered
सर्व-अर्थान्
all things
विपरीतान्
perversely
च
and
बुद्धिः
intellect
सा
that
पार्थ
O Partha
तामसी
tamasic.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! जो बुद्धि तमस् से आच्छन्न होकर अधर्म को धर्म मानती है और सम्पूर्ण पदार्थों को विपरीत (उल्टा) देखती है – वह बुद्धि तामसी है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
तामस बुद्धि अज्ञान से ढकी रहती है। वह अधर्म को ही धर्म समझती है, और हर बात को उल्टा देखती है। इसमें विवेक का पूर्ण अभाव होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! जो बुद्धि अज्ञान से आवृत होकर अधर्म को ही धर्म मान लेती है और सभी पदार्थों को विपरीत रूप में देखती है – वह बुद्धि तामसी है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
तामस बुद्धि अज्ञान के अंधकार में भटकती है। वह सत्य और असत्य का भेद नहीं कर पाती, इसलिए विनाश का कारण बनती है।