श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 33

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 3 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
धृत्या
by firmness
यया
which
धारयते
sustains
मनः-प्राण-इन्द्रिय-क्रियाः
the activities of the mind, life-breaths, and senses
योगेन
by yoga
अव्यभिचारिण्या
unswerving
धृतिः
firmness
सा
that
पार्थ
O Partha
सात्त्विकी
sattvic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! जिस धृति (दृढ़ता) के द्वारा अव्यभिचारिणी योग (अटल एकाग्रता) से मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण किया जाता है – वह धृति सात्त्विकी है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक धृति अटल और योगयुक्त होती है। यह मन, प्राण और इन्द्रियों को सही मार्ग पर स्थिर रखती है, विचलित नहीं होती। ऐसी धृति से साधक अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पार्थ! जिस धृति (दृढ़ता) के द्वारा अटल योग से मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण किया जाता है – वह धृति सात्त्विकी है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सात्त्विक धृति व्यक्ति को साधना में स्थिर रखती है। वह विघ्नों में भी नहीं डिगती, और साधक को मंजिल तक पहुँचाती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 33/78 42% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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