श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 34

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यया
by which
तु
but
धर्म-काम-अर्थान्
dharma, pleasure, and wealth
धृत्या
by firmness
धारयते
holds
अर्जुन
O Arjuna
प्रसङ्गेन
with attachment
फल-आकाङ्क्षी
desirous of fruits
धृतिः
firmness
सा
that
पार्थ
O Partha
राजसी
rajasic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! किन्तु जिस धृति से मनुष्य आसक्तिपूर्वक फल की इच्छा रखते हुए धर्म, काम और अर्थ का आश्रय लेता है – वह धृति राजसी है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

राजस धृति में फल की आसक्ति और इच्छा होती है। व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम को पाने के लिए दृढ़ तो रहता है, पर उसमें आसक्ति और फलेच्छा होने के कारण वह राजस कहलाती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! किन्तु जिस धृति के द्वारा आसक्तिपूर्वक फल की इच्छा रखने वाला मनुष्य धर्म, काम और अर्थ का आश्रय लेता है – वह धृति राजसी है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

राजस धृति में भले ही दृढ़ता हो, पर उसमें फल की चाह और आसक्ति छिपी होती है, जो बन्धन का कारण बनती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 34 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 34/78 44% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!