श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 35

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
यया
by which
स्वप्नम्
sleep
भयम्
fear
शोकम्
grief
विषादम्
despair
मदम्
arrogance
एव
indeed
च
and
न
not
विमुञ्चति
gives up
दुर्मेधा
one of evil intellect
धृतिः
firmness
सा
that
पार्थ
O Partha
तामसी
tamasic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! जिस धृति के द्वारा दुर्मेधा (मन्दबुद्धि) मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद (घमण्ड) को नहीं छोड़ता – वह धृति तामसी है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तामस धृति दुर्बुद्धि व्यक्ति की होती है। वह निद्रा, भय, शोक, निराशा, अहंकार आदि दोषों को नहीं त्याग पाता। यह धृति वास्तव में दृढ़ता न होकर जड़ता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पार्थ! जिस धृति के कारण दुर्मेधा (मूढ़) मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और घमण्ड को नहीं छोड़ पाता – वह धृति तामसी है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

तामस धृति व्यक्ति को उसके दोषों में ही स्थिर रखती है। वह उसे उन्नति के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ने देती।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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