मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदसुखम्
happiness
तु
indeed
इदानीम्
now
त्रि-विधम्
threefold
शृणु
hear
मे
from Me
भरत-ऋषभ
O best of the Bharatas
अभ्यासात्
by practice
रमते
one enjoys
यत्र
where
दुःख-अन्तम्
end of sorrow
च
and
निगच्छति
attains.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भरतश्रेष्ठ! अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख को सुन। जिस सुख का अभ्यास करने से मनुष्य रमण करता है और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अब सुख के तीन प्रकार बताने जा रहे हैं। पहले सात्त्विक सुख का परिचय देते हुए कहते हैं कि उसके अभ्यास से सुख की प्राप्ति और दुःख का अन्त होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भरतश्रेष्ठ! अब तू मुझसे तीन प्रकार के सुख को सुन। जिस सुख का अभ्यास करने से मनुष्य रमण करता है और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सुख भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है। सात्त्विक सुख वह है जो अभ्यास से बढ़ता है और दुःख का नाश करता है।