मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदयत् तत्
that which
अग्रे
in the beginning
विषम् इव
like poison
परिणामे
at the end
अमृत-उपमम्
like nectar
तत्
that
सुखम्
happiness
सात्त्विकम्
sattvic
प्रोक्तम्
is declared
आत्म-बुद्धि-प्रसाद-जम्
born from one's own intellect and self-realization.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो सुख प्रारम्भ में विष के समान (कष्टदायक) और परिणाम में अमृत के समान (सुखद) है, तथा आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है – वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सात्त्विक सुख प्रारम्भ में कठिन लगता है (जैसे ध्यान या व्रत), पर अन्त में वह आनन्ददायी होता है। यह आत्मचिन्तन और शुद्ध बुद्धि से उत्पन्न होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो सुख प्रारम्भ में विष के समान (कष्टदायी) और परिणाम में अमृत के समान (सुखद) होता है, तथा आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है – वह सुख सात्त्विक कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आध्यात्मिक साधना प्रारम्भ में कठिन लगती है, पर उसका परिणाम शाश्वत आनन्द है। सात्त्विक सुख आत्मज्ञान से प्राप्त होता है।