श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 37

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 3 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
यत् तत्
that which
अग्रे
in the beginning
विषम् इव
like poison
परिणामे
at the end
अमृत-उपमम्
like nectar
तत्
that
सुखम्
happiness
सात्त्विकम्
sattvic
प्रोक्तम्
is declared
आत्म-बुद्धि-प्रसाद-जम्
born from one's own intellect and self-realization.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो सुख प्रारम्भ में विष के समान (कष्टदायक) और परिणाम में अमृत के समान (सुखद) है, तथा आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है – वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक सुख प्रारम्भ में कठिन लगता है (जैसे ध्यान या व्रत), पर अन्त में वह आनन्ददायी होता है। यह आत्मचिन्तन और शुद्ध बुद्धि से उत्पन्न होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो सुख प्रारम्भ में विष के समान (कष्टदायी) और परिणाम में अमृत के समान (सुखद) होता है, तथा आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है – वह सुख सात्त्विक कहलाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आध्यात्मिक साधना प्रारम्भ में कठिन लगती है, पर उसका परिणाम शाश्वत आनन्द है। सात्त्विक सुख आत्मज्ञान से प्राप्त होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 37/78 47% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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