मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदविषय-इन्द्रिय-संयोगात्
from the contact of senses with their objects
यत् तत्
that which
अग्रे
in the beginning
अमृत-उपमम्
like nectar
परिणामे
at the end
विषम् इव
like poison
तत्
that
सुखम्
happiness
राजसम्
rajasic
स्मृतम्
is considered.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, जो प्रारम्भ में अमृत के समान (सुखद) और परिणाम में विष के समान (दुःखद) है – वह सुख राजस कहा गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस सुख इन्द्रियों के भोग से मिलता है, शुरू में अत्यधिक सुखद लगता है, पर अन्त में दुःख का कारण बनता है। यह क्षणिक और बन्धनकारी है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से होता है, जो प्रारम्भ में अमृत के समान और परिणाम में विष के समान होता है – वह सुख राजस कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भोगों का सुख शुरू में भले ही अच्छा लगे, पर उसके परिणाम दुःखद होते हैं। इसलिए विवेकी पुरुष ऐसे सुख से बचते हैं।