श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 38

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
विषय-इन्द्रिय-संयोगात्
from the contact of senses with their objects
यत् तत्
that which
अग्रे
in the beginning
अमृत-उपमम्
like nectar
परिणामे
at the end
विषम् इव
like poison
तत्
that
सुखम्
happiness
राजसम्
rajasic
स्मृतम्
is considered.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, जो प्रारम्भ में अमृत के समान (सुखद) और परिणाम में विष के समान (दुःखद) है – वह सुख राजस कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

राजस सुख इन्द्रियों के भोग से मिलता है, शुरू में अत्यधिक सुखद लगता है, पर अन्त में दुःख का कारण बनता है। यह क्षणिक और बन्धनकारी है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से होता है, जो प्रारम्भ में अमृत के समान और परिणाम में विष के समान होता है – वह सुख राजस कहलाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भोगों का सुख शुरू में भले ही अच्छा लगे, पर उसके परिणाम दुःखद होते हैं। इसलिए विवेकी पुरुष ऐसे सुख से बचते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 38/78 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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