मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदन
not
तत्
that
अस्ति
exists
पृथिव्याम्
on earth
वा
or
दिवि
in heaven
देवेषु
among the gods
वा
or
पुनः
again
सत्त्वम्
being
प्रकृतिजैः
born of Prakriti
मुक्तम्
free
यत्
which
एभिः
from these
स्यात्
could be
त्रिभिः
three
गुणैः
gunas.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
पृथ्वी में अथवा स्वर्ग में, देवताओं में भी, ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् स्पष्ट करते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि में – चाहे मनुष्य हो, देवता हों, या अन्य योनियाँ – सभी तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के अधीन हैं। कोई भी जीव इनसे पूर्णतया मुक्त नहीं है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
पृथ्वी पर या स्वर्ग में, देवताओं में भी, कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
त्रिगुणात्मक प्रकृति का यह सम्पूर्ण संसार है। सभी जीव इन गुणों के अधीन हैं। इनसे परे जाना ही मोक्ष है।