मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदब्राह्मण-क्षत्रिय-विशाम्
of Brahmins, Kshatriyas, and Vaishyas
शूद्राणाम्
of Shudras
च
and
परन्तप
O scorcher of foes
कर्माणि
duties
प्रविभक्तानि
are divided
स्वभाव-प्रभवैः
born of their own nature
गुणैः
by the gunas.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – इनके कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अब वर्णाश्रम धर्म के अनुसार विभिन्न वर्णों के स्वाभाविक कर्म बताते हैं। यह विभाजन गुणों और कर्मों पर आधारित है, जन्म पर नहीं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – इनके कर्म उनके स्वाभाविक गुणों के अनुसार विभाजित हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
वर्णव्यवस्था जन्म पर नहीं, गुण-कर्म पर आधारित है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कर्तव्य का पालन करना चाहिए।