श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 41

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशाम्
of Brahmins, Kshatriyas, and Vaishyas
शूद्राणाम्
of Shudras
च
and
परन्तप
O scorcher of foes
कर्माणि
duties
प्रविभक्तानि
are divided
स्वभाव-प्रभवैः
born of their own nature
गुणैः
by the gunas.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – इनके कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् अब वर्णाश्रम धर्म के अनुसार विभिन्न वर्णों के स्वाभाविक कर्म बताते हैं। यह विभाजन गुणों और कर्मों पर आधारित है, जन्म पर नहीं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – इनके कर्म उनके स्वाभाविक गुणों के अनुसार विभाजित हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

वर्णव्यवस्था जन्म पर नहीं, गुण-कर्म पर आधारित है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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