मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥४३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदशौर्यम्
valor
तेजः
splendor
धृतिः
firmness
दाक्ष्यम्
resourcefulness
युद्धे
in battle
च
and
अपि
also
अपलायनम्
not fleeing
दानम्
charity
ईश्वर-भावः
lordliness
च
and
क्षात्रम्
of a Kshatriya
कर्म
duty
स्वभाव-जम्
born of his own nature.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
शौर्य (वीरता), तेज (प्रभाव), धृति (दृढ़ता), दाक्ष्य (कुशलता), युद्ध में न भागना, दान और ऐश्वर्यभाव – ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण: वीरता, तेज, धैर्य, चतुराई, युद्ध से न भागना, दानशीलता, और नेतृत्व क्षमता। ये गुण उसे शासन और रक्षा के योग्य बनाते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
शौर्य (वीरता), तेज (प्रताप), धृति (धैर्य), दाक्ष्य (कुशलता), युद्ध में न भागना, दान और ईश्वरभाव (नेतृत्व) – ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
क्षत्रिय के ये गुण समाज के संरक्षण और धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। इनका पालन करके वह अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है।