श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 44

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
कृषि-गोरक्ष्य-वाणिज्यम्
agriculture, cattle-rearing, and trade
वैश्य-कर्म
the duty of a Vaishya
स्वभाव-जम्
born of his own nature
परिचर्या-आत्मकम्
consisting of service
कर्म
duty
शूद्रस्य
of a Shudra
अपि
also
स्वभाव-जम्
born of his own nature.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सेवा रूपी कर्म शूद्र के भी स्वाभाविक हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

वैश्य का स्वाभाविक कर्म: कृषि, पशुपालन, व्यापार। शूद्र का स्वाभाविक कर्म: सेवा। ये सभी वर्णों के कर्तव्य उनके स्वभाव के अनुकूल हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सेवा रूपी कर्म शूद्र के स्वाभाविक हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

प्रत्येक वर्ण के अपने स्वाभाविक कर्तव्य हैं। उनका पालन करके व्यक्ति समाज में योगदान देता है और अपनी आत्मिक उन्नति भी कर सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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