मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदकृषि-गोरक्ष्य-वाणिज्यम्
agriculture, cattle-rearing, and trade
वैश्य-कर्म
the duty of a Vaishya
स्वभाव-जम्
born of his own nature
परिचर्या-आत्मकम्
consisting of service
कर्म
duty
शूद्रस्य
of a Shudra
अपि
also
स्वभाव-जम्
born of his own nature.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सेवा रूपी कर्म शूद्र के भी स्वाभाविक हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
वैश्य का स्वाभाविक कर्म: कृषि, पशुपालन, व्यापार। शूद्र का स्वाभाविक कर्म: सेवा। ये सभी वर्णों के कर्तव्य उनके स्वभाव के अनुकूल हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सेवा रूपी कर्म शूद्र के स्वाभाविक हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
प्रत्येक वर्ण के अपने स्वाभाविक कर्तव्य हैं। उनका पालन करके व्यक्ति समाज में योगदान देता है और अपनी आत्मिक उन्नति भी कर सकता है।