श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 45

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
स्वे स्वे
in one's own
कर्मणि
duty
अभिरतः
engaged
संसिद्धिम्
perfection
लभते
attains
नरः
a man
स्व-कर्म-निरतः
devoted to one's own duty
सिद्धिम्
perfection
यथा
as
विन्दति
obtains
तत्
that
शृणु
hear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अपने-अपने कर्म में तत्पर हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुन।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्तव्य का पालन करते हुए मनुष्य परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। अब वे उस विधि को बताएँगे।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अपने-अपने कर्तव्य में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में रत व्यक्ति जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुनो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

कर्तव्यपालन ही साधना है। यदि व्यक्ति अपने धर्म का पालन निष्काम भाव से करता है, तो वह धीरे-धीरे आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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