मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदस्वे स्वे
in one's own
कर्मणि
duty
अभिरतः
engaged
संसिद्धिम्
perfection
लभते
attains
नरः
a man
स्व-कर्म-निरतः
devoted to one's own duty
सिद्धिम्
perfection
यथा
as
विन्दति
obtains
तत्
that
शृणु
hear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अपने-अपने कर्म में तत्पर हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुन।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्तव्य का पालन करते हुए मनुष्य परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। अब वे उस विधि को बताएँगे।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अपने-अपने कर्तव्य में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। स्वकर्म में रत व्यक्ति जिस प्रकार सिद्धि को पाता है, उसे सुनो।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
कर्तव्यपालन ही साधना है। यदि व्यक्ति अपने धर्म का पालन निष्काम भाव से करता है, तो वह धीरे-धीरे आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।