मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदयतः
from whom
प्रवृत्तिः
the emanation
भूतानाम्
of all beings
येन
by whom
सर्वम्
all
इदम्
this
ततम्
is pervaded
स्व-कर्मणा
by one's own duty
तम्
Him
अभ्यर्च्य
worshiping
सिद्धिम्
perfection
विन्दति
attains
मानवः
a man.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति हुई और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने कर्म द्वारा आराधना करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
स्वकर्म के पालन का रहस्य यह है कि उसे ईश्वर की आराधना के रूप में करना चाहिए। समस्त कर्मों का स्वामी और व्यापक ईश्वर ही है। उसकी उपासना ही सच्ची सिद्धि है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिस परमात्मा से सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसकी अपने कर्म द्वारा आराधना करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
हर कर्म को ईश्वर को समर्पित कर देना ही सच्ची पूजा है। इस भाव से किया गया कर्म बन्धन नहीं करता, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाता है।