मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदश्रेयान्
better
स्वधर्मः
one's own duty
विगुणः
devoid of merit
पर-धर्मात्
than another's duty
सु-अनुष्ठितात्
well-performed
स्वभाव-नियतम्
prescribed by one's own nature
कर्म
action
कुर्वन्
performing
न
not
आप्नोति
attains
किल्बिषम्
sin.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अपना धर्म भले ही गुणहीन (त्रुटिपूर्ण) हो, पर दूसरे के धर्म से जो भलीभाँति किया गया हो, वह श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक गीता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराता है। अपने स्वाभाविक धर्म का पालन करना, चाहे वह अपूर्ण हो, दूसरे के धर्म को पूर्णता से करने से बेहतर है। स्वधर्म में कोई पाप नहीं लगता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अपना धर्म भले ही गुणहीन (त्रुटियुक्त) हो, पर दूसरे के धर्म से जो सुन्दरतापूर्वक किया गया हो, वह श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करना ही उचित है। दूसरे के धर्म का अनुकरण करने से विपरीत परिणाम हो सकता है।