श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 48

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 3 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥४८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
सहजम्
born with (innate)
कर्म
duty
कौन्तेय
O son of Kunti
स-दोषम्
with fault
अपि
even
न
not
त्यजेत्
should abandon
सर्व-आरम्भाः
all undertakings
हि
indeed
दोषेण
by evil
धूमेन
by smoke
अग्निः
fire
इव
like
आवृताः
are covered.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! सहज (स्वाभाविक) कर्म यदि दोषयुक्त भी हो, तो उसे नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सम्पूर्ण आरम्भ (कर्म) दोष से उस प्रकार आवृत हैं जैसे धुएँ से अग्नि।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

कोई भी कर्म पूर्णतः दोषरहित नहीं होता, जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है। इसलिए अपने स्वाभाविक कर्म को, चाहे उसमें कुछ दोष हों, नहीं छोड़ना चाहिए। उन दोषों के बावजूद उसे करना ही श्रेयस्कर है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कौन्तेय! सहज (स्वाभाविक) कर्म यदि दोषयुक्त भी हो, तो उसे नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सभी कर्म दोष से उसी प्रकार आवृत हैं जैसे धुएँ से अग्नि।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

संसार में कोई भी कर्म पूर्ण नहीं है। दोषों के भय से कर्म त्यागना उचित नहीं। अपने कर्तव्य का पालन ईश्वरार्पण भाव से करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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