मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥४९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदअसक्त-बुद्धिः
whose intellect is unattached
सर्वत्र
everywhere
जित-आत्मा
who has conquered the self
विगत-स्पृहः
free from desire
नैष्कर्म्य-सिद्धिम्
the perfection of actionlessness
परमाम्
supreme
संन्यासेन
by renunciation
अधिगच्छति
attains.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो इच्छा से रहित है – वह संन्यास के द्वारा नैष्कर्म्य (कर्मों के अभाव) रूपी परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सच्चा संन्यासी वह है जो बुद्धि से अनासक्त, आत्मजयी और स्पृहारहित है। ऐसा व्यक्ति नैष्कर्म्य की सिद्धि पाता है, अर्थात् कर्म करते हुए भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जो जितेन्द्रिय है, और जिसकी समस्त कामनाएँ नष्ट हो गई हैं, वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धि (कर्मों के अभाव की सिद्धि) को प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सच्चा संन्यास केवल कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि आसक्ति और कामना का त्याग है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी अकर्मा ही है।