मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदसिद्धिम्
perfection
प्राप्तः
having attained
यथा
as
ब्रह्म
the Supreme
तथा
so
आप्नोति
attains
निबोध
understand
मे
from Me
समासेन
in brief
एव
indeed
कौन्तेय
O son of Kunti
निष्ठा
the culmination
ज्ञानस्य
of knowledge
या
which
परा
supreme.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे संक्षेप में मुझसे जान। ज्ञान की जो परा निष्ठा (परम अवस्था) है, उसे समझ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अब उस परम ज्ञान का वर्णन करने जा रहे हैं, जिसके द्वारा सिद्ध पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है। यह ज्ञान की पराकाष्ठा है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कौन्तेय! जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे तू मुझसे संक्षेप में जान। वह ज्ञान की जो परम निष्ठा है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ज्ञान की परम निष्ठा ही ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग है। इसे समझना हर साधक के लिए आवश्यक है।