श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 50

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
सिद्धिम्
perfection
प्राप्तः
having attained
यथा
as
ब्रह्म
the Supreme
तथा
so
आप्नोति
attains
निबोध
understand
मे
from Me
समासेन
in brief
एव
indeed
कौन्तेय
O son of Kunti
निष्ठा
the culmination
ज्ञानस्य
of knowledge
या
which
परा
supreme.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे संक्षेप में मुझसे जान। ज्ञान की जो परा निष्ठा (परम अवस्था) है, उसे समझ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् अब उस परम ज्ञान का वर्णन करने जा रहे हैं, जिसके द्वारा सिद्ध पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है। यह ज्ञान की पराकाष्ठा है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कौन्तेय! जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे तू मुझसे संक्षेप में जान। वह ज्ञान की जो परम निष्ठा है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ज्ञान की परम निष्ठा ही ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग है। इसे समझना हर साधक के लिए आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 50/78 64% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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