श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 5

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यज्ञ-दान-तपः-कर्म
actions of sacrifice, charity, and austerity
न
not
त्याज्यम्
to be abandoned
कार्यम्
must be performed
एव
indeed
तत्
that
यज्ञः
sacrifice
दानम्
charity
तपः
austerity
च
and
एव
also
पावनानि
purifying
मनीषिणाम्
for the wise.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ, दान और तप - ये कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि करने ही योग्य हैं। यज्ञ, दान और तप विद्वान् पुरुषों को भी पवित्र करने वाले हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ, दान, तप जैसे नित्य कर्म त्याज्य नहीं हैं। ये तो साधक को पवित्र करते हैं। इसलिए इन्हें करना चाहिए, पर फल की आसक्ति रहित होकर।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यज्ञ, दान और तप के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि उन्हें करना ही चाहिए। क्योंकि ये बुद्धिमानों को भी पवित्र करने वाले हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शुभ कर्मों का त्याग न करके उन्हें निष्काम भाव से करना चाहिए। ऐसे कर्म हमारी बुद्धि को शुद्ध कर मोक्ष के मार्ग पर ले जाते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 5/78 6% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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