मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदएतानि
these
अपि
also
तु
indeed
कर्माणि
actions
सङ्गम्
attachment
त्यक्त्वा
having abandoned
फलानि
fruits
च
and
कर्तव्यानि
ought to be done
इति
thus
मे
My
पार्थ
O Partha
निश्चितम्
certain
मतम्
opinion
उत्तमम्
supreme.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों का त्याग करके करना चाहिए - यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अब स्पष्ट करते हैं कि यज्ञादि कर्म करने चाहिए, परन्तु आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर। यही निष्काम कर्मयोग का सार है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इन यज्ञ, दान, तप आदि कर्मों को भी आसक्ति और फल की इच्छा का त्याग करके करना चाहिए - यह मेरा निश्चित एवं श्रेष्ठ मत है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
कर्म करना आवश्यक है, लेकिन उनके साथ आसक्ति न हो। फल की चिंता किए बिना कर्तव्य समझकर कर्म करना ही उत्तम मार्ग है।