श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 7

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
नियतस्य
of prescribed duties
तु
indeed
संन्यासः
renunciation
कर्मणः
of action
न
not
उपपद्यते
is proper
मोहात्
due to delusion
तस्य
of that
परित्यागः
abandonment
तामसः
in the mode of ignorance
परिकीर्तितः
is declared.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

नियत कर्मों का संन्यास उचित नहीं है। मोह से उनका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

नित्य नैमित्तिक कर्म (जैसे सन्ध्या, यज्ञ) जो शास्त्र द्वारा विहित हैं, उनका त्याग करना उचित नहीं। यदि अज्ञान या मोहवश त्याग किया जाए तो वह तामस त्याग है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

नित्य-नैमित्तिक कर्मों का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उनका त्याग करना तामस त्याग कहलाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शास्त्रविहित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उन्हें त्यागना अज्ञान का लक्षण है और आत्महानि का कारण बनता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 7/78 9% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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