मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पददुःखम्
painful
इति
thus
एव
indeed
यत्
which
कर्म
action
काय-क्लेश-भयात्
from fear of bodily trouble
त्यजेत्
one may renounce
सः
that person
कृत्वा
having done
राजसम्
in the mode of passion
त्यागम्
renunciation
न
not
एव
indeed
त्याग-फलम्
fruit of renunciation
लभेत्
obtains.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कर्म दुःखरूप है, ऐसा मानकर शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, वह राजस त्याग करता है और उसे त्याग का फल नहीं मिलता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कुछ लोग कर्म को कठिन या शरीर को कष्ट देने वाला समझकर त्याग देते हैं। यह राजस त्याग है, जो सात्त्विक त्याग के फल से वंचित रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो व्यक्ति कर्म को दुःखदायक समझकर शारीरिक कष्ट के डर से त्याग देता है, वह राजस त्याग करता है और त्याग का फल नहीं पाता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
त्याग का अर्थ कठिनाई से भागना नहीं है। सच्चा त्याग तो आसक्ति और फलेच्छा का त्याग है, न कि कर्म का।