मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
7 पदविविक्त-सेवी
dwelling in solitude
लघु-आशी
eating lightly
यत-वाक्-काय-मानसः
controlling speech, body, and mind
ध्यान-योग-परः
engaged in meditation
नित्यम्
constantly
वैराग्यम्
detachment
समुपाश्रितः
having resorted to.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
एकान्तसेवी, अल्पाहारी, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, नित्य ध्यानयोग में तत्पर, और वैराग्य का आश्रय लेकर...
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
साधना के और चरण: एकान्तवास, मिताहार, वाणी-शरीर-मन पर नियंत्रण, निरन्तर ध्यान, और वैराग्य का आश्रय।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
एकान्त में रहने वाला, अल्पाहारी, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, नित्य ध्यानयोग में लीन, और वैराग्य का आश्रय लेकर...
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ये बाह्य और आन्तरिक साधनाएँ हैं जो साधक को आत्मसाक्षात्कार के लिए तैयार करती हैं।