श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 53

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अहंकारम्
ego
बलम्
arrogance
दर्पम्
pride
कामम्
desire
क्रोधम्
anger
परिग्रहम्
possessiveness
विमुच्य
having abandoned
निर्ममः
free from the sense of "mine"
शान्तः
peaceful
ब्रह्म-भूयाय
for becoming Brahman
कल्पते
is fit.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अहंकार, बल (घमण्ड), दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह (संग्रह) का त्याग करके, ममता से रहित और शान्त होकर – वह ब्रह्मभूत होने के योग्य हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इन सब दोषों से मुक्त होकर, ममतारहित और शान्तचित्त साधक ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अहंकार, बल (दम्भ), दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह (संग्रहवृत्ति) का त्याग करके, ममता से रहित और शान्त होकर – वह ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मज्ञान के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अहंकार, काम, क्रोध आदि को त्याग दे। तभी वह ब्रह्म में स्थित हो सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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