मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदअहंकारम्
ego
बलम्
arrogance
दर्पम्
pride
कामम्
desire
क्रोधम्
anger
परिग्रहम्
possessiveness
विमुच्य
having abandoned
निर्ममः
free from the sense of "mine"
शान्तः
peaceful
ब्रह्म-भूयाय
for becoming Brahman
कल्पते
is fit.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अहंकार, बल (घमण्ड), दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह (संग्रह) का त्याग करके, ममता से रहित और शान्त होकर – वह ब्रह्मभूत होने के योग्य हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इन सब दोषों से मुक्त होकर, ममतारहित और शान्तचित्त साधक ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अहंकार, बल (दम्भ), दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह (संग्रहवृत्ति) का त्याग करके, ममता से रहित और शान्त होकर – वह ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आत्मज्ञान के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अहंकार, काम, क्रोध आदि को त्याग दे। तभी वह ब्रह्म में स्थित हो सकता है।