श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 54

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 3 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
ब्रह्म-भूतः
one who has become Brahman
प्रसन्न-आत्मा
with a serene self
न
not
शोचति
grieves
न
not
काङ्क्षति
desires
समः
equal
सर्वेषु
in all
भूतेषu
beings
मत्-भक्तिम्
devotion to Me
लभते
attains
पराम्
supreme.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

ब्रह्मभूत (ब्रह्मरूप) हुआ, प्रसन्नचित्त पुरुष न तो शोक करता है और न कामना करता है। सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जो ब्रह्म को प्राप्त हो गया, वह शोक-कामना से मुक्त, सबमें समदर्शी हो जाता है। ऐसा व्यक्ति भगवान् की परा भक्ति प्राप्त करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

ब्रह्मभूत (ब्रह्म में स्थित) व्यक्ति प्रसन्न चित्त वाला होता है, न शोक करता है न कामना। सब प्राणियों में समान भाव रखते हुए वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ब्रह्मज्ञान के बाद भी भक्ति का महत्व है। ज्ञानी भी भक्ति के द्वारा भगवान् के परम प्रेम को प्राप्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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