मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदब्रह्म-भूतः
one who has become Brahman
प्रसन्न-आत्मा
with a serene self
न
not
शोचति
grieves
न
not
काङ्क्षति
desires
समः
equal
सर्वेषु
in all
भूतेषu
beings
मत्-भक्तिम्
devotion to Me
लभते
attains
पराम्
supreme.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ब्रह्मभूत (ब्रह्मरूप) हुआ, प्रसन्नचित्त पुरुष न तो शोक करता है और न कामना करता है। सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो ब्रह्म को प्राप्त हो गया, वह शोक-कामना से मुक्त, सबमें समदर्शी हो जाता है। ऐसा व्यक्ति भगवान् की परा भक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ब्रह्मभूत (ब्रह्म में स्थित) व्यक्ति प्रसन्न चित्त वाला होता है, न शोक करता है न कामना। सब प्राणियों में समान भाव रखते हुए वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ब्रह्मज्ञान के बाद भी भक्ति का महत्व है। ज्ञानी भी भक्ति के द्वारा भगवान् के परम प्रेम को प्राप्त करता है।