श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 56

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
सर्व-कर्माणि
all actions
अपि
even
सदा
always
कुर्वाणः
performing
मत्-व्यपाश्रयः
taking refuge in Me
मत्-प्रसादात्
by My grace
अवाप्नोति
attains
शाश्वतम्
eternal
पदम्
abode
अव्ययम्
imperishable.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सब कर्मों को सदा करता हुआ भी, मेरे शरण हुआ मनुष्य मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्त कर्म करता रहता है, पर वह भगवान् के शरण होता है। भगवान् की कृपा से वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। यह कर्मयोग और भक्तियोग का समन्वय है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

सभी कर्मों को सदा करता हुआ भी, जो मेरी शरण में है, वह मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शरणागति ही मुख्य है। कर्म करते हुए भी यदि ईश्वर के प्रति समर्पण है, तो उसकी कृपा अवश्य मिलती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 56/78 72% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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