मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदसर्व-कर्माणि
all actions
अपि
even
सदा
always
कुर्वाणः
performing
मत्-व्यपाश्रयः
taking refuge in Me
मत्-प्रसादात्
by My grace
अवाप्नोति
attains
शाश्वतम्
eternal
पदम्
abode
अव्ययम्
imperishable.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सब कर्मों को सदा करता हुआ भी, मेरे शरण हुआ मनुष्य मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्त कर्म करता रहता है, पर वह भगवान् के शरण होता है। भगवान् की कृपा से वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। यह कर्मयोग और भक्तियोग का समन्वय है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
सभी कर्मों को सदा करता हुआ भी, जो मेरी शरण में है, वह मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
शरणागति ही मुख्य है। कर्म करते हुए भी यदि ईश्वर के प्रति समर्पण है, तो उसकी कृपा अवश्य मिलती है।