मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदचेतसा
by the mind
सर्व-कर्माणि
all actions
मयि
in Me
संन्यस्य
renouncing
मत्-परः
intent on Me
बुद्धि-योगम्
the yoga of intellect
उपाश्रित्य
resorting to
मत्-चित्तः
with mind fixed on Me
सततम्
always
भव
become.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सम्पूर्ण कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त लगाने वाला बन।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् आदेश देते हैं: सभी कर्मों को मन से मुझे अर्पण करो, मेरे प्रति समर्पित रहो, बुद्धियोग (समबुद्धि) का सहारा लो, और सदा मुझमें चित्त लगाओ।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मन से समस्त कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें चित्त लगाने वाला बन।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह भक्तियोग और कर्मयोग का संगम है। कर्म करते हुए भी मन से ईश्वर में स्थित रहना ही सच्ची साधना है।