मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदमत्-चित्तः
with mind fixed on Me
सर्व-दुर्गाणि
all obstacles
मत्-प्रसादात्
by My grace
तरिष्यसि
you will cross
अथ
but
चेत्
if
त्वम्
you
अहंकारात्
from ego
न
not
श्रोष्यसि
will listen
विनङ्क्ष्यसि
you will perish.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मुझमें चित्त लगाने वाला तू मेरी कृपा से सब दुर्गम विपत्तियों को पार कर जाएगा। परन्तु यदि तू अहंकार से नहीं सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् स्पष्ट चेतावनी देते हैं: यदि अर्जुन उनके उपदेश को अहंकारवश नहीं मानता, तो वह नष्ट हो जाएगा। किन्तु यदि वह उनमें चित्त लगाकर उनकी शरण लेता है, तो वे उसकी रक्षा करेंगे।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मुझमें चित्त लगाने वाला तू मेरी कृपा से सब दुर्गम बाधाओं को पार कर जाएगा। परन्तु यदि तू अहंकार से मेरी बात नहीं सुनेगा, तो नष्ट हो जाएगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर की शरणागति ही सुरक्षा है। अहंकार और स्वतंत्रता का भाव विनाश का कारण बनता है।