मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदयत्
if
अहंकारम्
ego
आश्रित्य
resorting to
न
not
योत्स्ये
I will fight
इति
thus
मन्यसे
you think
मिथ्या
false
एष
this
व्यवसायः
determination
ते
your
प्रकृतिः
your nature
त्वाम्
you
नियोक्ष्यति
will engage.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यदि तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मानता है कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा", तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है; तेरा स्वभाव ही तुझे (युद्ध में) प्रवृत्त करेगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अर्जुन को समझाते हैं कि यदि वह अहंकार से युद्ध न करने की ठानता है, तो उसका स्वभाव (क्षत्रिय धर्म) उसे युद्ध के लिए बाध्य कर देगा। उसकी यह न चाहना मिथ्या है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यदि तू अहंकार का आश्रय लेकर यह सोचता है कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा", तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है; तेरा स्वभाव तुझे युद्ध में प्रवृत्त करेगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
हमारी प्रकृति हमें वैसा कर्म करने के लिए बाध्य करती है जैसा हमारे स्वभाव के अनुकूल है। अतः अपने स्वधर्म का पालन करना ही श्रेयस्कर है।