मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदस्वभाव-जेन
born of your own nature
कौन्तेय
O son of Kunti
निबद्धः
bound
स्वेन
by your own
कर्मणा
action
कर्तुम्
to do
न
not
इच्छसि
you wish
यत्
which
मोहात्
from delusion
करिष्यसि
you will do
अवशः
unwillingly
अपि
even
तत्
that.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधा हुआ तू मोहवश जिस कर्म को नहीं करना चाहता, उसे भी तू विवश होकर करेगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन अपने क्षत्रिय स्वभाव से उत्पन्न कर्म (युद्ध) से बँधा हुआ है। चाहे वह अभी मोहवश युद्ध न करना चाहे, परन्तु परिस्थितियाँ उसे विवश कर देंगी। इसलिए बेहतर है कि वह समझदारी से युद्ध करे।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कौन्तेय! अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधा हुआ तू मोहवश जिस कर्म को नहीं करना चाहता, उसे भी तू विवश होकर करेगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
व्यक्ति अपने स्वभाव के अधीन है। इसलिए मोह छोड़कर कर्तव्य का पालन करना ही बुद्धिमानी है।