श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 61

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
ईश्वरः
the Lord
सर्व-भूतानाम्
of all beings
हृत्-देशे
in the heart
अर्जुन
O Arjuna
तिष्ठति
dwells
भ्रामयन
causing to revolve
सर्व-भूतानि
all beings
यन्त्र-आरूढानि
mounted on a machine
मायया
by His Maya.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में ईश्वर स्थित है, जो माया द्वारा सब प्राणियों को यन्त्र पर बैठे हुए की भाँति घुमा रहा है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् सर्वव्यापी हैं और सबके हृदय में विराजमान हैं। वे अपनी मायाशक्ति से सब जीवों को उनके कर्मानुसार यन्त्रवत् घुमाते हैं। यह जीव की परतन्त्रता को दर्शाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में ईश्वर स्थित है, जो माया द्वारा सब प्राणियों को यन्त्र पर बैठे हुए की भाँति घुमा रहा है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सबके अन्तर्यामी हैं। वे ही सबका संचालन करते हैं। इस ज्ञान से व्यक्ति को विनम्रता और समर्पण का भाव आता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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