मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥६५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदमत्-मनाः
with mind fixed on Me
भव
become
मत्-भक्तः
My devotee
मत्-याजी
My worshipper
माम्
to Me
नमः कुरु
bow down
माम्
to Me
एव
alone
एष्यसि
you will come
सत्यम्
truly
ते
to you
प्रतिजाने
I promise
प्रियः
dear
असि
you are
मे
to Me.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझको नमस्कार कर। इस प्रकार तू मुझको ही प्राप्त होगा। मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह गीता का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक है, जो भक्तियोग का सार है। भगवान् स्पष्ट रूप से वचन देते हैं कि जो उनमें मन लगाता है, उनका भक्त बनता है, उनकी पूजा करता है और उन्हें नमस्कार करता है, वह उन्हें ही प्राप्त होता है। यह प्रतिज्ञा अटल है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझको नमस्कार कर। इस प्रकार तू मुझको ही प्राप्त होगा। मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह भक्ति का सर्वोच्च मार्ग है। भगवान् स्वयं वचन देते हैं कि उनकी शरण में आने वाला कभी नष्ट नहीं होता, अन्ततः उन्हें ही प्राप्त होता है।