श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 66

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
सर्व-धर्मान्
all duties
परित्यज्य
abandoning
माम्
Me
एकम्
alone
शरणम्
refuge
व्रज
take
अहम्
I
त्वा
you
सर्व-पापेभ्यः
from all sins
मोक्षयिष्यामि
will liberate
मा
do not
शुचः
grieve.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत कर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध और सारगर्भित श्लोक है। भगवान् कहते हैं कि समस्त धर्मों का परित्याग करके केवल उनकी शरण में जाने से वे सब पापों से मुक्त कर देंगे। यह पूर्ण शरणागति का सिद्धान्त है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

सब धर्मों (कर्तव्यों) का परित्याग करके केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत कर।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह गीता का सर्वोच्च रहस्य है। ईश्वर की पूर्ण शरणागति ही सबसे सरल और सुनिश्चित मोक्ष मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 66/78 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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