मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदइदम्
this
ते
by you
न
not
अतपस्काय
to one who is not austere
न
not
अभक्ताय
to one who is not a devotee
कदाचन
ever
न
not
च
and
अशुश्रूषवे
to one who does not serve
वाच्यम्
to be spoken
न
not
च
and
माम्
Me
यः
who
अभ्यसूयति
cavils at.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यह (ज्ञान) तपस्वी को छोड़कर, अभक्त को, अशुश्रूषु (सेवा न करने वाले) को और मुझसे द्वेष करने वाले को कभी नहीं कहना चाहिए।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अर्जुन को निर्देश देते हैं कि इस गोपनीय ज्ञान को अयोग्य व्यक्तियों को न बताए। यह तपस्वी, भक्त, सेवापरायण और ईश्वर में श्रद्धा रखने वाले को ही देना चाहिए।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यह (ज्ञान) तपस्वी को छोड़कर, अभक्त को, सेवा न करने वाले को और मुझसे द्वेष करने वाले को कभी नहीं कहना चाहिए।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आध्यात्मिक ज्ञान को सुरक्षित रखना और उसे पात्र व्यक्ति को ही देना चाहिए, क्योंकि अपात्र को देने से वह ज्ञान नष्ट हो जाता है और हानि हो सकती है।