मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥७१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदश्रद्धा-वान्
with faith
अनसूयः
without envy
च
and
शृणुयात्
hears
अपि
even
यः
who
नरः
a man
सः
he
अपि
also
मुक्तः
liberated
शुभान्
auspicious
लोकान्
worlds
प्राप्नुयात्
attains
पुण्य-कर्मणाम्
of the virtuous.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और द्वेष रहित होकर इस (गीता) को सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गीता को श्रद्धा और बिना द्वेष के सुनने मात्र से भी मनुष्य पापमुक्त होकर पुण्यलोकों को प्राप्त होता है। यह गीता के श्रवण की महिमा है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो श्रद्धा और अनसूया (द्वेष रहित) के साथ इस (गीता) को सुनेगा, वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
गीता के प्रति श्रद्धा और सद्भावना रखने वाला श्रोता भी महान् पुण्य का भागी बनता है।