मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदकच्चित्
whether
एतत्
this
श्रुतम्
heard
पार्थ
O Partha
त्वया
by you
एकाग्रेण
with single-pointed
चेतसा
mind
कच्चित्
whether
अज्ञान-सम्मोहः
the delusion of ignorance
प्रनष्टः
destroyed
ते
your
धनञ्जय
O Dhananjaya.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! क्या यह (गीता) तूने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अब अर्जुन से पूछते हैं कि क्या उसने गीता को एकाग्रचित्त होकर सुना और क्या उसका मोह दूर हो गया। यह शिक्षक द्वारा शिष्य की समझ की जाँच है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! क्या यह (गीता) तूने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ज्ञान प्राप्ति के बाद यह आत्मनिरीक्षण आवश्यक है कि वास्तव में समझ में आया या नहीं।