श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 74

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सञ्जय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
सञ्जय
Sanjaya
उवाच
said
इति
thus
अहम्
I
वासुदेवस्य
of Vasudeva (Krishna)
पार्थस्य
of Partha (Arjuna)
च
and
महा-आत्मनः
of the great soul
संवादम्
dialogue
इमम्
this
अश्रौषम्
heard
अद्भुतम्
wonderful
रोमहर्षणम्
thrilling.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सञ्जय बोले: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांचक संवाद को सुना।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि उन्होंने यह अद्भुत संवाद सुना, जो अत्यन्त रोमांचकारी है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

सञ्जय बोले: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांचकारी संवाद को सुना।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गीता का यह संवाद अद्भुत है, जिसे सुनकर रोमांच होता है। यह मानव इतिहास का सर्वोच्च आध्यात्मिक संवाद है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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