श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 57

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 2 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यः
जो
सर्वत्र
सर्वत्र
अनभिस्नेहः
स्नेहरहित (बिना आसक्ति)
तत् तत्
वह-वह
प्राप्य
प्राप्त करके
शुभाशुभम्
शुभ और अशुभ
न
नहीं
अभिनन्दति
हर्षित होता
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित (बिना आसक्ति) है और इस प्रकार शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

स्थितप्रज्ञ शुभ-अशुभ परिस्थितियों में भी समान रहता है – न हर्ष, न द्वेष।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित है, और शुभ या अशुभ को प्राप्त होकर न हर्षित होता है न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। He who is without attachment everywhere, who neither rejoices nor hates on obtaining good or evil – his wisdom is established.

निर्विकार / Unaffected

स्थितप्रज्ञ पर किसी भी बाहरी परिस्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 57 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 57/72 79% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!