श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 58

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 3 मिनट का पठन 111 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||५८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यदा
जब
संहरते
समेट लेता है
च
और
अयम्
यह
कूर्मः
कछुआ
अङ्गानि
अंगों को
इव
जैसे
सर्वशः
सब ओर से
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
इन्द्रियार्थेभ्यः
इन्द्रियों के विषयों से
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह (पुरुष) इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

कछुए का दृष्टान्त – वह जैसे अपने अंगों को भीतर खींच लेता है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपने वश में कर लेता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब पुरुष इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। When, like a tortoise which withdraws its limbs, he withdraws his senses from sense objects, then his wisdom is steady.

इन्द्रिय-निग्रह / Sense Control

इन्द्रियों को विषयों से हटाना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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श्लोक 58/72 81% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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