मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः | रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||५९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदविषयाः
विषय
विनिवर्तन्ते
निवृत्त हो जाते हैं
निराहारस्य
आहार (भोग) का त्याग करने वाले
देहिनः
शरीरी की
रसवर्जम्
रस (स्वाद) को छोड़कर
रसः
रस
अपि
भी
अस्य
इसकी
परम्
परम (ब्रह्म)
दृष्ट्वा
देखकर
निवर्तते
निवृत्त हो जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
भोगों का त्याग करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनका रस (आस्वाद) निवृत्त नहीं होता। किन्तु परम (ब्रह्म) को देख लेने पर उसका रस भी निवृत्त हो जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
केवल भोगों का त्याग करने से उनकी इच्छा (रस) शेष रह जाती है, पर ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद वह इच्छा भी समाप्त हो जाती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भोगों का त्याग करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनका रस (इच्छा) शेष रहता है। किन्तु परम ब्रह्म को देख लेने पर वह रस भी निवृत्त हो जाता है। Sense objects turn away from the abstinent person, but the longing remains. However, even that longing turns away when one sees the Supreme.
परम दर्शन / Vision of the Supreme
आत्मसाक्षात्कार ही सभी इच्छाओं का अन्त है।