श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 60

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 2 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||६०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
यततः
प्रयत्न करते हुए
हि
निश्चय ही
अपि
भी
कौन्तेय
हे कौन्तेय
पुरुषस्य
पुरुष के
विपश्चितः
बुद्धिमान
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
प्रमाथीनि
प्रमाथी (प्रबल)
हरन्ति
हर लेती हैं
प्रसभम्
बलपूर्वक
मनः
मन को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! प्रयत्न करते हुए भी बुद्धिमान पुरुष के प्रबल (चंचल) इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को हर लेती हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि प्रयत्नशील और बुद्धिमान व्यक्ति का भी मन वे बलपूर्वक हर सकती हैं। यह इन्द्रिय-दमन की कठिनाई को दर्शाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कौन्तेय! प्रयत्न करते हुए भी बुद्धिमान पुरुष के प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को हर लेती हैं। The senses are so strong and impetuous that they forcibly carry away the mind even of a wise man who is striving to control them.

चेतावनी / Warning

इन्द्रियाँ अत्यन्त प्रबल हैं, इसलिए सावधानी से उनका नियंत्रण करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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श्लोक 60/72 83% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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