मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदतानि
उन (इन्द्रियों) को
सर्वाणि
सब
संयम्य
वश में करके
युक्तः
योगी
आसीत
स्थित हो
मत्परः
मुझ परमात्मा में परायण
वशे
वश में
हि
निश्चय ही
यस्य
जिसके
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर बैठे (स्थित हो)। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इन्द्रिय-निग्रह के बाद योगी को भगवत्परायण होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर स्थित हो। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। Having controlled all the senses, one should remain steadfast in yoga, devoted to Me. For one whose senses are under control, his wisdom is steady.
साधना / Practice
इन्द्रिय-निग्रह और ईश्वर-निष्ठा ही स्थितप्रज्ञता का मार्ग है।