श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 62

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 2 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते | सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ||६२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
ध्यायतः
चिन्तन करते हुए
विषयान्
विषयों का
पुंसः
पुरुष के
सङ्गः
आसक्ति
तेषु
उनमें
उपजायते
उत्पन्न होती है
सङ्गात्
आसक्ति से
सञ्जायते
उत्पन्न होता है
कामः
कामना
कामात्
कामना से
क्रोधः
क्रोध
अभिजायते
उत्पन्न होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

विषयों का चिन्तन करते हुए पुरुष की उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक पतन की प्रक्रिया बताता है – विषय-चिन्तन से आसक्ति, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। When a person dwells on sense objects, attachment arises. From attachment, desire is born. From desire, anger arises.

मनोविज्ञान / Psychology

यह श्लोक मानव मन की गहरी प्रक्रिया का वर्णन करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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श्लोक 62/72 86% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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