मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदरागद्वेषवियुक्तैः
राग-द्वेष से रहित
तु
तो
विषयान्
विषयों को
इन्द्रियैः
इन्द्रियों द्वारा
चरन्
चलता हुआ (भोगता हुआ)
आत्मवश्यैः
अपने वश में किए हुए
विधेयात्मा
वश में किए हुए अन्तःकरण वाला
प्रसादम्
प्रसाद (शान्ति)
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राग-द्वेष से मुक्त होकर, वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों का सेवन करने वाला व्यक्ति शान्ति पाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता है और जिसका अन्तःकरण वश में है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। But a person who, being free from attraction and repulsion, controls his senses and governs his mind, attains peace.
सम्यक् व्यवहार / Right Conduct
संसार में रहते हुए भी राग-द्वेष से मुक्त रहकर कर्म करना ही शान्ति का मार्ग है।