श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 65

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 2 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||६५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
प्रसादे
प्रसाद (शान्ति) प्राप्त होने पर
सर्वदुःखानाम्
सब दुःखों की
हानिः
हानि
अस्य
इसकी
उपजायते
हो जाती है
प्रसन्नचेतसः
प्रसन्न चित्त वाले की
हि
निश्चय ही
आशु
शीघ्र
बुद्धिः
बुद्धि
पर्यवतिष्ठते
सम्यक् प्रकार से स्थित हो जाती है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस प्रसाद (शान्ति) के प्राप्त होने पर इसके (साधक के) सब दुःखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

शान्ति प्राप्त होने पर सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं, और प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि स्थिर हो जाती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उस शान्ति के प्राप्त होने पर उसके सब दुःखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है। In that peace, all sorrows are destroyed. For the intellect of one who is peaceful and content soon becomes steady.

शान्ति का फल / Fruit of Peace

शान्ति से बुद्धि स्थिर होती है और सभी दुःख मिट जाते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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