श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 66

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||६६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
अस्ति
है
बुद्धिः
बुद्धि
अयुक्तस्य
अयुक्त (असंयत) का
न
नहीं
च
और
अयुक्तस्य
अयुक्त का
भावना
भावना (ध्यान)
न
नहीं
च
और
अभावयतः
ध्यान न करने वाले का
शान्तिः
शान्ति
अशान्तस्य
अशान्त का
कुतः
कहाँ
सुखम्
सुख।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान) होती है, और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

असंयत व्यक्ति के पास न तो सही बुद्धि होती है, न ध्यान। बिना ध्यान के शान्ति नहीं, और बिना शान्ति के सुख नहीं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान), और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ? One who is not connected (through yoga) has neither steady intellect nor meditation. Without meditation, there is no peace. Without peace, how can there be happiness?

आवश्यकता / Necessity

योग और संयम के बिना सुख असम्भव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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