मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||६६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदन
नहीं
अस्ति
है
बुद्धिः
बुद्धि
अयुक्तस्य
अयुक्त (असंयत) का
न
नहीं
च
और
अयुक्तस्य
अयुक्त का
भावना
भावना (ध्यान)
न
नहीं
च
और
अभावयतः
ध्यान न करने वाले का
शान्तिः
शान्ति
अशान्तस्य
अशान्त का
कुतः
कहाँ
सुखम्
सुख।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान) होती है, और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
असंयत व्यक्ति के पास न तो सही बुद्धि होती है, न ध्यान। बिना ध्यान के शान्ति नहीं, और बिना शान्ति के सुख नहीं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान), और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ? One who is not connected (through yoga) has neither steady intellect nor meditation. Without meditation, there is no peace. Without peace, how can there be happiness?
आवश्यकता / Necessity
योग और संयम के बिना सुख असम्भव है।