मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||६७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदइन्द्रियाणाम्
इन्द्रियों का
हि
निश्चय ही
चरताम्
विचरते हुए
यत्
जो
मनः
मन
अनुविधीयते
अनुगमन करता है
तत्
वह
अस्य
इसकी
हरति
हर लेती है
प्रज्ञाम्
प्रज्ञा को
वायुः
हवा
नावम्
नाव को
इव
जैसे
अम्भसि
जल में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इन्द्रियाँ विषयों में विचरती हैं, और यदि मन उनके पीछे-पीछे चलता है, तो वह प्रज्ञा को नष्ट कर देता है – जैसे हवा नाव को डुबो देती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है। Just as a boat on the water is swept away by a strong wind, the mind that follows the wandering senses carries away one's discrimination.
सावधानी / Caution
इन्द्रियों पर नियंत्रण न रखने से प्रज्ञा नष्ट हो जाती है।