मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः | परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ||११||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पददेवान्
देवताओं को
भावयत
प्रसन्न करो
अनेन
इस (यज्ञ) से
ते
वे
देवा
देवता
भावयन्तु
प्रसन्न करें
व
तुम्हें
परस्परम्
परस्पर
भावयन्त
प्रसन्न करते हुए
श्रेय
कल्याण
परम्
परम
अवाप्स्यथ
प्राप्त करोगे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस यज्ञ के द्वारा तुम देवताओं को प्रसन्न करो और वे देवता तुम्हें प्रसन्न करें। इस प्रकार परस्पर प्रसन्न करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यज्ञ का एक और आयाम – देवता और मनुष्य का पारस्परिक सहयोग। देवताओं को यज्ञ से प्रसन्न करके उनसे वर्षा आदि प्राप्त करना, जिससे संसार चलता है। यह एक सहकारी चक्र है। Another dimension of yajña – mutual cooperation between gods and humans. Pleasing the gods through sacrifice brings rains etc., which sustain the world. It is a cycle of mutual nourishment.
श्लोक का अर्थ / Meaning
यज्ञ से देवताओं को तृप्त करो, वे तुम्हें तृप्त करें – इस परस्पर सहयोग से कल्याण होगा। Please the gods through sacrifice; they will please you – this mutual cooperation brings welfare.