मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः | तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ||१२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदइष्टान्
वांछित
भोगान्
भोगों को
हि
निश्चय ही
व
तुम्हें
देवा
देवता
दास्यन्ते
देंगे
यज्ञभाविता
यज्ञ द्वारा प्रसन्न किए हुए
तै
उनके द्वारा
दत्तान्
दिए हुए
अप्रदाय
न देकर
एभ्य
उनको (देवताओं को)
य
जो
भुङ्क्ते
भोगता है
स्तेन
चोर
एव
ही
स
वह।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता तुम्हें वांछित भोग देंगे। जो उनके द्वारा दिए हुए भोगों को उन्हें (देवताओं को) अर्पित किए बिना ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भगवान एक नैतिक सिद्धान्त बताते हैं – जो कुछ भी हमें देवताओं (प्रकृति, समाज) से मिलता है, उसका कुछ अंश लौटाना हमारा कर्तव्य है। ऐसा न करना चोरी के समान है। Here the Lord gives a moral principle: whatever we receive from the gods (nature, society), it is our duty to return a part. Not doing so is equivalent to theft.
श्लोक का अर्थ / Meaning
देवताओं द्वारा दिए भोगों को बिना उन्हें अर्पित किए भोगना चोरी है। Enjoying the gifts of the gods without offering to them is theft.