श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 13

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 156 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||१३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यज्ञशिष्ट
यज्ञ से बचे हुए अन्न को
अशिन
खाने वाले
सन्त
सज्जन
मुच्यन्ते
मुक्त हो जाते हैं
सर्वकिल्बिषै
सब पापों से
भुञ्जते
भोगते हैं
ते
वे
तु
तो
अघम्
पाप को
पापा
पापी
ये
जो
पचन्ति
पकाते हैं
आत्मकारणात्
अपने लिए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिए (बिना यज्ञ किए) भोजन पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक सामूहिक जीवन और साझा करने के महत्व पर जोर देता है। जो केवल अपने लिए कमाता और खाता है, वह पाप का भागी होता है। सच्चा सुखी वह है जो बाँटकर खाता है। This verse emphasises the importance of sharing and communal life. One who earns and eats only for oneself partakes of sin. True happiness lies in sharing.

श्लोक का अर्थ / Meaning

यज्ञ के बचे हुए अन्न को खाने वाले पाप मुक्त होते हैं; स्वार्थी पाप खाते हैं। Those who eat remnants of sacrifice are freed from sin; the selfish eat sin.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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