मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||१३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदयज्ञशिष्ट
यज्ञ से बचे हुए अन्न को
अशिन
खाने वाले
सन्त
सज्जन
मुच्यन्ते
मुक्त हो जाते हैं
सर्वकिल्बिषै
सब पापों से
भुञ्जते
भोगते हैं
ते
वे
तु
तो
अघम्
पाप को
पापा
पापी
ये
जो
पचन्ति
पकाते हैं
आत्मकारणात्
अपने लिए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिए (बिना यज्ञ किए) भोजन पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक सामूहिक जीवन और साझा करने के महत्व पर जोर देता है। जो केवल अपने लिए कमाता और खाता है, वह पाप का भागी होता है। सच्चा सुखी वह है जो बाँटकर खाता है। This verse emphasises the importance of sharing and communal life. One who earns and eats only for oneself partakes of sin. True happiness lies in sharing.
श्लोक का अर्थ / Meaning
यज्ञ के बचे हुए अन्न को खाने वाले पाप मुक्त होते हैं; स्वार्थी पाप खाते हैं। Those who eat remnants of sacrifice are freed from sin; the selfish eat sin.